Saturday, July 9, 2016

सच को बुनने जैसा कुछ!



देखता हूँ, पांडिचेरी के इस औरो बीच पर
रेत से खेलती उस छोटी सी लड़की को,
हर बार अलग शक्लोसूरत की, घर जैसा बनाकर कुछ  
लहरों का इंतज़ार करती है,
पुन: नए सिरे से नयी शक्ल....
कितनी महिलाएं और कितने लोग ऐसा सोच पाते हैं?
वख्त से आगे खड़े होकर
वख्त के आने का इंतज़ार
सच को बुनने जैसा कुछ!   

बारहा सच को बुनने की कोशिश की,
कुछ यादों की पोटली से,
कुछ परकटे ख़्वाबों से,
कुछ मरासिम से,
घर और घरौंदे का फर्क इत्ता सा ही होता है,

एक सच से बुनते हैं, एक ख्वाब से!

Monday, December 24, 2012

उदास पानी






वो देर तक आईने में
चेहरा टटोलती रही
उभरते हुई गड्ढे
और झुर्रियों को पाटने में,
हाँ, उसने एक उम्र बिताई थी!
याद नही, कब पिछली बार
उसने चेहरे से बातें की थी,
कभी उससे पूछा हो,
ये उदासी क्यूँ?
अहह! इस उदासी को
बयाँ करती वो झुर्रियाँ
अब खाई बन चुकी थी!

Monday, October 15, 2012

मैं जानता हूँ, यही सच है! - A perception



















मेरे ख़्वाबों के टुकड़ों को बिखेर कर देखना

शायद कोई टुकड़ा तुम्हारा भी हो!

_______


मैंने बारहा अपना आस्तित्व मिटाने की कोशिश की|

पर आस्तित्व विहीन होने के बजाय,

और मजबूत होता गया|

पीछे मूड़ के देखता हूँ, तो

असल में जिसे मैंने खोना चाहा था,

वो खोना नही था!

अजीब लगता है पर,

मैं जानता हूँ, यही सच है!

खोना भी पाने जैसा होता है|

अगर हम खोने के सिमटते दायरे को देख सकें,

तो पाने का बढ़ता दायरा साफ़ नज़र आने लगता है|

पर उलझनें तब दुखद अहसास देती है,

जब हमारी खुशी इन दायरों से परे,

कहीं और अटक जाती है|

क्या खोया? क्या पाया?


कितना अजीब है?

पाने के लिए थमना पड़ता है

समग्र नही व्यग्र होकर,

और थमना या रुकना क्या खोना नही है?

इसलिए, खोना या पाना शायद

हमारे अहसास से इतर कुछ भी नही!

हाँ, अजीब है, पर,

मैं जानता हूँ, यही सच है!

Thursday, April 26, 2012

तुम न होगी तो....



मैं सुबह के चाँद का एहसास लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   

हो तरल कुछ तो 
जिसे मन-प्राण-कंठों में उतारें 
धुप की संवेदना 
जल की मछलियों को दुलारे 

यह नहीं तो उस तरफ संन्यास लेकर क्या करूंगा  
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा    

एक गोकुल प्राण में हो
एक गोकुल प्राण ऊपर 
मन कहीं पर रह गया हो
पोर भर का स्पर्श होकर 

दिक् तुम्हारा, मैं उधर कम्पास लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   

जो न लिखना तो 
कहे क्या ख़ाक गूंगी व्यंजनाएँ
सात रंगों में ढली 
उनचास पवनों की व्यथाएँ

गर बेमौसम तो वहां बसंताभास्  लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा    



द्वारा रचित  - हृदयेश्वर 

‘गीतायन‘, प्रेमनगर, रामभद्र (रामचौरा), हाजीपुर-844101, वैशाली 
 (रविन्द्र प्रकाश जी को विशेष धन्यवाद, जिन्होंने इस सरल पर सुन्दर कविता को वटवृक्ष पर पोस्ट किया)

Friday, April 20, 2012

बचपन

मेरे पड़ोस में, 
ढ़ेड-एक साल का एक बच्चा रहता है
वो कन्नड़ है और मैं हिंदी,

गाहे-बगाहे जब भी पास से गुजरता हूँ, 
इठलाता खिलखिलाता सामने दिखता है
मेरे घुटनों से आ लिपटता है

मैं देखता हूँ पीछे उसकी दादी
दूध और गुड़ी रोटी का कटोरा लिए पास बुला रही है    
मैं पूछता हूँ क्यूँ रे खाना नही खाना?
वो नही में सर डुलाता है
उसकी दादी समझ नही पाती, पर 
वो नादान समझ लेता है

सारा खेल आँखों का है, 
बचपन में हम किसी की गोद में जाने से पहले
उसकी आँखों में झांककर 
दोस्त और दुश्मन को ताड़ लेते थे

पर अब तो नजारा दुसरा है,
अब तो आँखे भी कमजोर है 
और होठ भी सिल गए हैं
बात सिर्फ दो मिनट की है....
पर वो ‘नट’ मुझे बचपन वाली हठ याद दिला देता है!   



लिखते समय जेहन में गुलज़ार दा की आवाज़ थी....सो इसे उसी तरीके से पढेंगे तो शायद ज्यादा मजा आएगा!




Sunday, March 25, 2012

बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में - त्रिपुरारि कुमार शर्मा





तुम्हारा भारत- 
एक डंडे की नोक पर फड़फड़ाता हुआ तीन रंगों का चिथड़ा है 
जो किसी दिन अपने ही पहिए के नीचे आकर 
तोड़ देगा अपना दम 
तुम्हारे दम भरने से पहले। 

मेरा भारत- 
चेतना की वह जागृत अवस्था है 
जिसे किसी भी चीज़ (शरीर) की परवाह नहीं 
जो अनंत है, असीम है 
और बह रही है निरंतर। 


तुम्हारा भारत- 
सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर 
महज कुछ लकीरों का समन्वय है 
जो एक दूसरे के ऊपर से गुज़रती हुईं 
आपस में ही उलझ कर मर जाएँगी एक दिन। 

मेरा भारत- 
एक स्वर विहीन स्वर है 
एक आकार विहीन आकार है 
जो सिमटा हुआ है ख़ुद में 
और फैला हुआ है सारे अस्तित्व पर। 

तुम्हारा भारत- 
सरहदों में सिमटा हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा है 
जिसे तुम ‘माँ’ शब्द की आड़ में छुपाते रहे 
और करते रहे बलात्कार हर एक लम्हा 
लाँघकर निर्लज्जता की सारी सीमाओं को। 


मेरा भारत- 
शर्म के साए में पलती हुई एक युवती है 
जो सुहागरात में उठा देती है अपना घुँघट 
प्रेमी की आगोश में बुनती है एक समंदर 
एक नए जीवन को जन्म देने के लिए। 

तुम्हारा भारत- 
राजनेताओं और तथा-कथित धर्म के ठेकेदारों 
दोनों की मिली-जुली साज़िश है 
जो टूटकर बिखर जाएगी किसी दिन 
अपने ही तिलिस्म के बोझ से दब कर। 


मेरा भारत- 
कई मोतियों के बीच से गुज़रता हुआ 
माला की शक्ल में वह धागा है 
जो मोतियों के बग़ैर भी अपना वजूद रखता है। 

बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में! 

tripurarimedia@gmail.com

Friday, March 23, 2012

शहीद–ए-आज़म के नाम एक कविता - विपिन चौधरी


उस वक़्त भी होंगे तुम्हारी बेचैन करवटों के बरक्स
चैन से सोने वाले
आज भी बिलों में कुलबुलाते हैं
तुम्हारी जुनून मिजाज़ी को "खून की गर्मी” कहने वाले

तुमने भी तो दुनिया को बिना परखे ही जान लिया होगा
जब
कई लंगोटिए यार तुम्हारी उठा-पटक से
परेशान हो
कहीं दूर छिटक गए होंगे

तुम्हारी भीगी मसों की गर्म तासीर से
शीशमहलों में रहने वालों की
दही जम जाया करती होगी

दिमागी नसों की कुण्डी खोले बिना ही तुम
समझ गए होगे कि
इन्सान- इन्सान में जमीन आसमान जितना असीम
फर्क भी हो सकता है

अपने चारों ओर बंधी बेड़ियों
के भार को संभालते हुए
कोयले से जो लिखा होगा तुमने
उसे पढ़
कईयों ने जानबूझ कर अनजान बन
अपनी गर्दन घुमा ली होगा
कई ठूंठ बन गए होंगे और
कई बहरे, काने और लंगडे बन
अपनी बेबसियों का बखान करने लगें होंगे

परेशान आज भी बहुत है दुनिया,
ज़रा सा कुरेदने पर
लहू के आंसूओं की
खड़ी नदियाँ बहा सकती है
पर क्रांति की बात दूसरी-तीसरी है

जनेऊ अब भी खीज में उतार दे कोई
पर वह बात नहीं बनती
जो मसीहाई की गली की ओर मुडती हो

’क्रांति’ बोल-वचन का मीठा और सूफियाना मुहावरा बन
कईयों के सर पर चढ
आज भी बेलगाम हो
भिनभिनाता है

लहू में पंगे शेरे-पंजाब की
दिलावरी को याद करने के लिए
पंजों के बल खडे होना पड़ता है
पर
हमारी तो शुरुआ़त ही लड़खडाने से होती है

हम हर पन्ने को शुरू से लेकर अंत तक पढते हैं
और
लकीर को लकीर ही कहते है

रटे-रटाये प्रश्नों के बीच आये
एक टेढे प्रश्न को बीच में ही छोड़
भाग खडे होते हैं

जब क्रांति का अर्थ समझने के लिए इतिहास की पुस्तके उठाते हैं
और सिर्फ उनकी धुल ही झडती है हमसे

हमारे समझने बूझने का
पिरामिड अब इतना बौना हो गया है
कि हमारी मुंडी क्रांति की चौखट से
टकराने लगती है

रात-बेरात का चौकनापन और
लहू को निचोड़ कर
बर्फ की सिल्ली बना देंने
का सिद्धहस्त शऊर
अब कारोबारी धंदे पर ही अपनी सान चढाता है

शहीद – ए –आज़म,
इंसान से पिस्सु बनने की प्रक्रिया को
तुम नही देख पाए
पाए
यही शुक्र है

घुटनों के बल पर खडे हो
शुक्र की इन्ही सूखी रोटियों को
खा-खा कर
हमारी नस्लें अपने आगे का
रोजगार बढ़ाएगी

Friday, March 2, 2012

जफ़र - एक नज़र




मैं वो बादशाह था जिसका दरबार कभी ग़ालिब, दाग और जौक से सजा करता था
हाँ! मैं ही वो बादशाह था जिसकी पोती आज चाय पिलाकर गुजारा किया करती है!







कहते हैं, जफ़र जफ़र न था
भारतीय इतिहास का गौरवमय सफर था




आंन्धियाँ गम की चलेंगी तो संवर जाउंगा
मैं तेरी जुल्फ नही जो रह-रह के बिखर जाउंगा

तुझसे बिछडा तो मत पूछ किधर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समंदर में उतर जाऊँगा

नाखुदा मुझसे न होगी खुशामद तेरी
मैं वो खुद्दार हूँ कश्ती से उतर जाऊँगा

मुझको सूली पे चढाने की जरुरत क्या है
मेरे हाथों से कलम छीन लो, मर जाऊँगा

मुझको दुनिया से ‘जफ़र’ कौन मिटा सकता है
मैं तो शायर हूँ  किताबों में बिखर जाउंगा – बहादुर शाह जफ़र     

Saturday, September 10, 2011

बस्ती






परिंदे घर बनाने निकले हैं 
किसी के सरकलम को निकले हैं 

जिंदगी कैफियत से बीत जाए, अपनी 
बस इतना ख्वाब ले के निकले हैं 

अपनी धरती को जब उजाड़ चुके 
बस्तियां चाँद पर बसाने निकले हैं 

कौन सुनेगा यहाँ 'अनुपम' की 
सब अपनी दास्ताँ भुनाने निकले हैं

उधेड़बुन



Source: Shiree Gilmore


इंतज़ार .....| 
उसकी नज़रें अभी तक टिकी हुई थी ..............| शायद किसी का इंतज़ार है उसे ! वह यहाँ क्यों आया है ? .....मन को सीमाओं को तोड़ने में बड़ा आनंद आता है , यही कारण है की एक समयांतर पर ये पुन: उसी कार्य को करने को आतुर हो उठता है |


कितनी बार नावों से सैर किया 
हर बार नाव का पतबार हाथ में , 
और नाव मझधार में 
बारिशों के बीच , तूफ़ान और झंझावातों में 
उप्लाता डूब गया | 


ऐसा लगता है अब , सदियों से बारिश नही हुई है | नही ..| जब पौधे ही नही होंगे तो छटपटाहट कैसी होगी |कौन सी होगी ? नही , प्रकृति विषम में बस्ता ज़रूर है लेकिन विषम नही | दिल कहता है पौधे उगेंगे प्यास बढ़ेगी फिर बारिश होगी | मिटटी अंदर तक भीगेगी .......हाँ अंदर तक | 
लेकिन प्यास बना रहे , ताकि अगली बारिश को आते देख आगे बढ़कर स्वागत कर सके और कहे देखो मेरे नैन अब भी वैसे ही हैं ........... देखो न , आँखे मुंद सी गयी है , अब और राह देखने को तैयार नही , शरीर रह -रहकर टूट सा जाता है | 
....क्या यह अंत है ? .या फिर नयी सदी के जन्म से पहले की छटपटाहट है | मौसम और मन दोनों ही उपयुक्त है ... बस इंतज़ार है तो......तेरा ....देखना है तू कब बरसती है ? 
(पल बीतता है ) 
.....उन शब्दों में वही लिख्खा था जो भीतर पड़ा था लेकिन भावनाओं में शायद नही | 
.........आश्चर्य होता है लोगों से खुद से भी , शब्दों को पकड़कर बैठ जाते हैं | 
क्या मानव का आस्तित्व शब्दों तक सीमित है ? उफ़ भावनाओं को गढ़ने का प्रयास ही क्यों किया |
......कुत्ते की आवाज़ ....उसने देखा सामने हाइवे पर ... वह पिल्ला जिंदगी से निजात पा गया | 
शायद खुदा को यही मंज़ूर था |
... क्या इन् प्राणियों को दैर-ओ-हरम की ज़रूरत नही होती ? 
उसका दिल बेज़ार हो उठा था 
....स्वर तीखा ही क्यों न हो उसे सुनकर हम उस आत्मा के भीतर छिपी मर्म को सहज ही खोज निकालते है |शायद यही वजह है कि कुदरत ने सभी प्राणियों में भरा है |...यहाँ तक की वैसे मनुष्यों में भी जो शब्द निकाल नही सकते |याद आती है उसे
....उसकी बातें ठहरावमुक्त थी ,जो जलता है वाही प्रकाश देता है , जीवन भी एक प्रकाश है ...फिर ज़हां प्रकाश नही वहाँ जीवन कैसे मौजूद हो सकता है ...! 
...मुझे तो लगता है जीवन घटनाओं में नही उसके पीछे किये गए प्रयासों में जीता है | 
उसे याद आया , रामेश्वर बीमार है ....वह उसे देखने नही गया ...दिल तो कहता है 

सुख जाने दो 
जो वृक्ष फल नही दे सकते 
देते हैं पर कष्ट आजीवन 
पीते हैं लहू दूसरों को करके घायल 
और जग में खुद बने रहते नूतन 
फिर , आज जब हुए हैं घायल , 
तो उन्हें सुख जाने दो | 


......और ...उसे कोई मानो गहरी नींद से जगा रहा था | उसकी आँखों में चमक सी दिख रही थी अब ...|
....बारिशों में भीगना अपने-आप में मज़े की बात होती है ऐसा लगता है जैसे आज कुदरत हम सबसे बहुत खुश है |....शायद इसीलिए हमें बाहर से और भीतर से भिगोरहा है | जो भी हो भीगना अच्छा लगता है |....जैसे...जैसे ... हम होली में खुशी से एक-दूसरे को भिगोते हैं जो भी हो भीगना अच्छा लगता है |भिगोने का भी तो अलग ही मज़ा है ....बारिश करके कुदरत भी आनंदित होता है , हमें भिगोकर ...|इसलिए भीगना चाहिए |
डोर टूट गयी | 
सदियां बीत गयी | 
आज फिर..........
पतंग ठीक है उड़ान भरने के लिए !

*****
Published in Zephyr 10.


शब्द ख़ामोशी के





सात दिनों से पिता बेड पर ही था , गहरी चोट थी पैर में .
कई बार धीरे-धीरे उठने का प्रयास करता , पर हिम्मत टूट जाती .

पुत्र जो अपने काम में व्यस्त था , उस रात डाटते हुए कहा - ' क्या पिताजी ! आप प्रयास भी नही कर सकते , 
डॉक्टर ने कितनी बार कहा है चलने को , नही तो पैर हमेशा के लिए खराब हो जायेंगे... और आप हो की बेड पर ही परे रहते हो . '
पिता सहम कर रह गया .
उस रात उसने कई दफे उठ कर  चलने की चेष्टा की लेकिन पेरो की असह्य पीड़ा उसे फिर से बेड पर जाने को मजबूर कर देती . पुत्र ने सबकुछ खिडकी से देखा और झुंझलाकर सो गया . 

दूसरा लड़का जो अगली सुबह ही परदेश से आया था , पिताजी को देखने .
उसने ख़ामोशी से ही पिताजी की खामोश शक्लों को पढ़ लिया .
उठा , उठकर कंधा दिया , तीन दिनों बाद ही पिताजी चलने-फिरने लग गए 
लड़का पुनः परदेश चला गया

Friday, May 13, 2011

हम- तुम - अनुपम कर्ण

(1)

कुछ कदमों के फासले थे, 
रह गया इधर मैं, उधर तुम 
ज़माना बीच में खडा कहता रहा 
हारा मैं, जीत गए तुम !
(2)

खामोश सी थी जिंदगी 
हम भी चुप से रह गए
तुम ने चुप्पी तोड़ दी 
और फासले फिर बढ़ गए !
(3)

कुछ बातें ..........................
कुछ  किस्से......................
कुछ लम्हे .........................
कुछ यादें ..........................
...........................और मैं था !
..........................और तुम थे!

कितनी बातें ......................
कितने किस्से ...................
कुछ चाहे ...........................
कुछ अनचाहे ....................
..........................कहीं मैं था!
.........................कहीं तुम थे!

किसकी बातें .....................
किसके किस्से ..................
कितने पुराने ....................
कितने अनजाने ...............
.........................क्यों मैं था?
........................क्यों तुम थे?

Wednesday, April 20, 2011

कुछ पंक्तियाँ - सुभद्रा कुमारी चौहान

ये चंद पंक्तियाँ वाकई बचपन की यादों से बड़ी गहराई से जुड़े हैं| ये पंक्तियाँ इसलिए भी खास है क्योंकि मैंने अपनी माँ को अपनी मधुर लय में अक्सर इसे गुनगुनाते हुए सूना है| 
ये पंक्तियाँ सुभद्रा जी की प्रसिद्द कविता " मेरा बचपन " से लिया गया है | जितनी उनकी कवितायें प्रेरणादायक है उससे भी कहीं ज्यादा उनकी जीवनी !









बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

Tuesday, March 29, 2011

आईना - Anupam Karn







आँख में आंसुओं  को सुलगता पाया 
उसने खुद से खुद को ढूंढता पाया
एक मरासिम ने आंच इस कदर दी थी
उसने सब्र को अब्र सा  लुढकता  पाया
रेत के मानिंद ढह गए थे जो
उनसे वख्त के आईने में एक मसीहा पाया
आज जब दीया फिर से जलने को है 
उसने  वख्त को आईने में भूलता पाया
वो होड़ जीत का था, ये शोर जीत का है
उसने अश्क को आईने में ढूंढता पाया !

Wednesday, February 23, 2011

मैं ...मैं हूँ तो मेरा मन, अब कहाँ मेरा ? - अनुपम कर्ण






वख्त दर वख्त दरकता है एक निशाँ मेरा
किसने आग़ी लगाई जो जल गया एक जहां मेरा


मेरी बंसी ने ही छीनी है मेरी आवाज को
गो तेरे किस्से बन गए एक नुमायाँ मेरा

मेरी रूहों से छलकती है तेरी आहों की खनक
वो तेरी खामोश सी नज़रें और एक अंदाज़--बयाँ मेरा 

मेरी तन्हाइयों से लिपटी है तेरी यादों की महक
मैं मैं हूँ तो मेरा मन अब कहाँ मेरा!

*******

Tuesday, December 28, 2010

तलाक - अनुपम कर्ण









शाम ढले तो अखियाँ तुझको बरबस ढूंढने लगती है
सुबह फिर अलसाई नजरें दुनिया देखने लगती है

नज़रें कहाँ-कहाँ न ढूँढी, चिराग तले अँधेरा छाया
ऋतू बसंत हो या सावन हो रह-रहकर छलकने लगती है

पहचान तुम्हारी हो या मेरी ,इसपर सर धुनना था कैसा
जो पहचान हमारी थी वो अब तो बासी लगती है

अब तो अलग- अलग हैं दोनों, नाम हमारे अलग-अलग
सोचो कितने दूर हुए क्यों अखियाँ प्यासी लगती है !

Sunday, December 5, 2010

गधे खा रहे चवनप्रास देखो - स्व.ओमप्रकाश आदित्य

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं    
जिधर भी देखता हूँ गधे ही गधे हैं

गधे हंस रहे , आदमी रो रहा है
 हिन्दोस्तान में ये क्या हो रहा है

 जवानी का आलम गधों के लिए है
 ये रसिया ,ये बालम गधों के लिए है

 ये दिल्ली ये पालम गधों के लिए है
 ये संसार सालम गधों के लिए है

 पिलाए जा साकी ,पिलाए जा डट के
 तू व्हिस्की के मटके पे मटके पे मटके

 मैं दुनिया को जब भूलना चाहता हूँ
 गधों की तरह झूमना चाहता हूँ

घोड़ों को मिलती नही घास देखो
 गधे खा रहे चवनप्रास देखो

 यहाँ आदमी की कहाँ कब बनी थी
 ये दुनिया गधों के लिए ही बनी थी

 जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
 जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

 जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
 जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

 मै क्या बक गया हूँ , ये क्या कह गया हूँ
 नशे की पिनक मे कहाँ बह गया हूँ
 
 मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
 वो ठरॉ था भीतर जो अटका हुआ था

Saturday, November 27, 2010

काँच की बरनी और दो कप चाय ** एक बोध कथा

एक पुरानी पर असरदार लघुकथा !

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है सब कुछ तेजी  से पा लेने की इच्छा होती है ,और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है । 
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... 
उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई हाँ ... आवाज आई ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी समा गये ,
फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा क्या अब बरनी भर गई है छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा 
अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... 
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना हाँ 
.. 
अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. 
सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ... 
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया – 
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो .... 
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान परिवार बच्चे मित्र स्वास्थ्य और शौक हैं 
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी कार बडा़ मकान आदि हैं और 
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें मनमुटाव झगडे़ है .. 

अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचतीया कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते रेत जरूर आ सकती थी ... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ...
यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे 
और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ...
मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो बगीचे में पानी डालो सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ 
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको मेडिकल चेक - अप करवाओ ... 
टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है 
... 
बाकी सब तो रेत है .. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..
अचानक एक ने पूछा सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ?
प्रोफ़ेसर मुस्कुराये बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी  ने क्यों नहीं किया ...
    इसका उत्तर यह है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की     जगह हमेशा होनी चाहिये । 

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