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Friday, October 22, 2010

तेरे बगैर भी मैं जी लेता हूँ - अनुपम कर्ण

                          






चलो कुछ तो था 
की, आज भी याद आता हूँ 
जो , तेरी डायरी के 
पन्नों में उभर आता हूँ 

दिन तो आफिस में 
आराम से गुजर जाता है 
रात की सर्द ख़ामोशी में 
तेरी यादों को ओढ़ लेता हूँ 

शाम को बालकनी में
महसूस होता है ,
धुआं -धुआं सा
कभी ये तेरी बातों से आजिज थे
अब तेरी यादों से लिपटे .....

किचेन में 
चाय बनाते हुए 
बेशक , कोई आवाज़ नही आती 
पर , कुछ प्रतिध्वनिया 
टूटे हुए प्रेमरस का कचड़ा 
घेर लेता है मुझे 
तुम कभी लौटती 
तो देख पाती 
तेरी कमी गुसिल तो नही , लेकिन 
तेरे बगैर भी मैं जी लेता हूँ

Saturday, April 24, 2010

सौदेबाज़ों से दोस्ती न की , वो दोस्ती में खूब सौदा करना



मंज़र-ए-इश्क का फूलना फलना
ये दरिया-ए-मय है या फिर कोई दवाखाना

देर शब् तेरी जुम्बिश की आखिरी वो खलिश
हमने खोया था तुझे अब तेरा पाना

रूह को भी गम है तेरे फिराक का
कैदे-हयात में इक आस्तां है सागर-ओ-मीना

तुम थे तो एक शहर थी हयात में
अब एक दलील हूँ उस्सक बूटों का बना

इश्क एक दरिया-ए-ज़ख्म है या बाज़ीचा-ए-अत्फाल
मुझसे पूछो न , न किसी मीरां  से पूछना

उसने दोस्त्दारों से पर्देकारी की, पर्देकारी में दोस्तदारी
सौदेबाज़ों से दोस्ती न की , वो दोस्ती में खूब सौदा करना

आज की रात फिर नही पढ़ा, ग़ज़ल लिख्खा है अनुपम ने
जो अब तलक समझ  में नही आया, तो क्या अब समझ के करना !

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