Tuesday, September 7, 2010

हौसला भी उड़ान देता है :- अशोक 'अंजुम '

कौन सीरत पे ध्यान देता है
आईना जब बयाँ देता है

मेरा किरदार इनदिनों ज़माने में
बारहा इम्तिहान देता है

पंख अपनी ज़गह पे वाजिब है
हौसला भी उड़ान देता है

जितने  मगरूर हुए जाते हैं
मौला उतनी ढलान देता है

बीती बातों को भुलाकर वो
आज फिर से जुबां देता है

तेरे बदले में किस तरह ले लूँ
वो तो सारा जहां देता है !

Friday, September 3, 2010

तेरी तपिश में जला हूँ , कहीं पनाह नहीं - मनु गौतम

मैं तुमसे दूर भी जाऊँ तो मुझको राह नहीं
तेरी तपिश में जला हूँ , कहीं पनाह नहीं

कहा बस इतना ही उसने उरुज पे लाकर
यहाँ पे ला के गिराना कोई गुनाह नहीं

धड़क उठेगा अभी देखना ये दिल कमबख्त
हजार टुकड़ों में टूटा है पर तबाह नहीं
 
वो शख्स जिसपे हमने दिल ओ जान वार दिए
वो हमखयाल तो है , पर मेरा हमराह नहीं
 
अब तो बस मैं हूँ , तू है और मांझी के फ़राज़
अब तमन्ना के सराबों की  दिल  को  चाह नहीं !

Wednesday, September 1, 2010

26/11 की कलम से - डॉ. स्वदेश कुमार भटनागर

खौफ के जब से हम हवाले हुए /
जैसे हम खुद पे लटके ताले हुए //

फिर रही है दुआएं भूखी-सी /
देवताओं के तौर काले हुए //

कैसे सच बोले आईना हमसे  ,
आईनों की जुबां पे छाले हुए //

यूँ सियाहपोश कर दिया सूरज ,
धुंध की शक्ल में उजाले हुए //

कुछ तो आँचल की ओट में था ' दिया '
कुछ इवा भी थी लौ संभाले हुए //

खून में भीगती रहेगी सदी 
कह रहे हैं शिगाफ डाले हुए //

आज मजहब से मिलके ये पूछें /
वख्त की कैसे झुक गयी आँखें //

इक मरा लफ्ज़ हाथ में लेकर ,
हम दरिंदो पे कब तलक सोचें //

रौशनी पे अँधेरा भारी है /
हादसों की ज़बान में गर बोले //

ज़ुल्म की उम्र लगती है लम्बी
अमन पर पड़ा इक कफ़न देखें //

दूब की तरह तुम रहो ऐ ' स्वदेश '
लोग जो चाहे तुम्हे वो समझे //
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