Monday, June 28, 2010

झरते हैं शब्दबीज - बुद्धिनाथ मिश्र

आहिस्ता -आहिस्ता
एक- एक कर
झरते हैं शब्दबीज
मन के भीतर !
हरे धान उग आते
परती खेतों में
हहराते सागर हैं
बंद निकेतोँ में
धूप में चिटखता है
तन का पत्थर !
राह दिखाते सपने
अंधी खोहो में
द्रव सा ढलता मैं
शब्दों की देहोँ में
लिखवाती पीड़ा है
हाथ पकड़कर !
फसलें झलकेँ जैसे
अँकुरे दानों में
आँखों के आँसू
बतियाते कानों में
अर्थों से परे गूँजता
मद्धिम स्वर !

Thursday, June 10, 2010

रफ्ता-रफ्ता द्वार से यूँ ही गुजर जाती है रात -अश्वघोष


रफ्ता-रफ्ता द्वार से यूँ ही गुजर जाती है रात
मैने देखा झील पर जाकर बिखर जाती है रात

मैं मिलूंगा कल सुबह इस रात से जाकर जरूर
जानता हूँ , बन संवरकर कब , किधर जाती है रात

हर कदम पर तीरगी है , हर तरफ एक शोर है
हर सुबह एकाध रहबर कत्ल कर जाती है रात

जैसे बिल्ली चुपके चुपके सीढ़ियाँ उतरे कहीं
आसमाँ से जिंदगी मे यूँ ही उतर जाती है रात

एक चिड़िया कुछ दिनों से पूछती है अश्वघोष
सिर्फ इस आहट को सुनके क्यों सिहर जाती है रात

Friday, May 28, 2010

Hostel memoirs : पर , रंग न रीता होली का !

  दिल जब याद उन दिनों को करता है
 बातें बार बार करता है


**पहला SESSIONAL **

पहला SESSIONAL ,EXAM नहीं था
था वो कोई आदमखोर

हम भी कहाँ भागने वाले
यूद्ध छेड़ दिया घनघोर


सारी रात डटे रहे थे हम
लेकर कलम रूपी औजार

कुछ  तो   मथुरा दास  बन गए
कुछ सुनील सन्नी जैकी श्राफ

** कुछ बातें कुछ शर्तेँ **

पूछो न , क्योँ हम लड़ते थे
वो , बात बात पर अड़ते थे

कृष्ण जन्मभूमि असली है या
नकली , फैसला रात भर में करते थे

जोश जोश में होश नहीं था
होश नहीं था दिल क्योँ फिर बेहोश नहीं था

शर्त लगी , वो अमृतसर जाने की
मत पूछो , क्योँ ? पैदल जाने की

दो खेमोँ में लगी शर्त थी
शब आधी , गीली पीली हरी शर्त थी

चल पड़े सभी , नहीं किसी ने भी किया इनकार
सबने सोचा हमसे पहले , उतर जाएगा इसका बुखार

**<बर्थ डे >**

किसी के बर्थ डे पे किसी को पीटना
था ये होस्टल का अपना रीत

रीत-वीत सब हवा हो जाती
वो ज्योँहि दिखता पवन मीत

**<नाम>**

सबके सब जाने अनजाने
नए नए नामों से जाने जाते

लाल बादशाह , नेताजी चडड्डी
तो कुछ आए गए निकले फिसड्ढी

**<होली >**

बेरंग पानी से खेल खेलकर
क्या रंग था निखड़ा होली का

दिल रीता , होस्टल रीता
पर , रंग न रीता होली का   !
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