Thursday, April 26, 2012

तुम न होगी तो....



मैं सुबह के चाँद का एहसास लेकर क्या करूंगा ।
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा  । ।

हो तरल कुछ तो 
जिसे मन-प्राण-कंठों में उतारें 
धुप की संवेदना 
जल की मछलियों को दुलारे 

यह नहीं तो उस तरफ संन्यास लेकर क्या करूंगा  ।
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा  । । 

एक गोकुल प्राण में हो
एक गोकुल प्राण ऊपर 
मन कहीं पर रह गया हो
पोर भर का स्पर्श होकर 

दिक् तुम्हारा, मैं उधर कम्पास लेकर क्या करूंगा ।
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा  । ।

जो न लिखना तो 
कहे क्या ख़ाक गूंगी व्यंजनाएँ
सात रंगों में ढली 
उनचास पवनों की व्यथाएँ

गर बेमौसम तो वहां बसंताभास्  लेकर क्या करूंगा ।
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा  । । 



द्वारा रचित  - हृदयेश्वर 

‘गीतायन‘, प्रेमनगर, रामभद्र (रामचौरा), हाजीपुर-844101, वैशाली 
 (रविन्द्र प्रकाश जी को विशेष धन्यवाद, जिन्होंने इस सरल पर सुन्दर कविता को वटवृक्ष पर पोस्ट किया)

4 comments:

  1. बहुत सुंदर... काफी दिनों बाद मैंने कोई सुंदर कविता पढ़ी है।
    www.rajnishonline.blogspot.com

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  2. Beautiful lines. And quite introspective.

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