Sunday, November 7, 2010

मदर हूँ मैं -अनुपम कर्ण

सहर हूँ मैं ,
तुम्हारे दर्द के हर रात का 
सहर हूँ मैं 

धीमे-धीमे दबे पाँव 
घंटो तुझे देखती रहती 
तुम्हारे सोने के  बाद 
ताकि ,कोई मच्छर न बैठने पावे ,वो 
नज़र हूँ मैं !

तमाम जिंदगी चाहे वो अच्छे रहे या बुरे 
खुद मट्ठा खाती रही 
ताकि तुझे दही खिला सकूँ , हाँ 
शज़र हूँ मैं !

मैं जानती हूँ ,
तुम्हारे लिए तुम्हारे बीवी ,तुम्हारे बच्चे ,
तुम्हारा आफिस ही तुम्हारा सबकुछ है 
मैं कुछ भी नही !
और यदि कुछ हूँ तो कितना 
कितना..? बता पाओगे तुम !
अपनी सोसाइटी अपना स्टेट्स बनाए रखने के लिए 
एक बार फिर से तुम दही खाओगे...और ...
तुम, तुम्हारे बच्चे दही खाते रहे 
इसलिए मैं मट्ठा खाऊँगी 
और , चुप रहूंगी....आखिर 
मदर हूँ मैं    



:- On Vatvriksh
  


Tuesday, November 2, 2010

कुछ पंक्तियाँ - जानकी बल्लभ शास्त्री

कहाँ मिले स्वर्गिये सुमन 
मेरी दुनिया मिटटी की ,
विहस बहन क्यों तुझे सताऊं
कसक बताकर जी की 

बस आखिरी विदा लेता हूँ 
आह यही इतना कह 
मुझसा भाई हो न किसी का 
तुझ सी बहन सभी की !!


____________________________
 मैं मगन मझधार में हूँ , तुम कहाँ हो !


दीप की लौ अभी ऊँची , अभी नीची
पवन की घन वेदना , रुक आँख मीची
अन्धकार अवंध , हो हल्का की गहरा
मुक्त कारागार में हूँ , तुम कहाँ हो
मैं मगन मझधार में हूँ , तुम कहाँ हो !

Monday, November 1, 2010

कुछ पंक्तियाँ - प्रसाद

जो घनीभूत पीड़ा थी 
मस्तक में स्मृति सी छाई 
दुर्दिन में आंसू  बनकर 
वह आज बरसने आयी 

शशिमुख पर घूँघट डाला 
अंचल में नैन छिपाए 
जीवन की गोधुली में 
कुतूहल से तुम आये 

(-आंसू )



बीती विभावरी जाग री !

                    अम्बर पनघट  में डुबो रही                  
                      तारा घाट उषा नागरी |

खग-कुल  कुल-कुल सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा  ,

                  लो यह लतिका भी भर लायी
                  मधु मुकुल नवल रस गागरी |

अधरों में राग अमद पिए
अलको में मलयज बंद किये

                  तू अब तक सोई है आली
                  आँखों में भरे विहाग री |
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