Friday, October 15, 2010

फिर हाथ हिलने लगते हैं - अनुपम कर्ण




आँखों के सामने 
गिरता है डब्लू टी सी 
कानो में गूंजता है 
२६/११ के बंदूकों की आवाज़ 
यादें ताज़ा कर देती है ये मेरियट होटल की 

सपनो में जब 
इराक का सफर करता हूँ 
एक भी घर नही मिलता 
शुकुन-ओ-चैन का 
फिर लौटता हूँ , मैं 
फिलिस्तीन , तालिबान , पाकिस्तान 
होते हुए कश्मीर को 
सुनता हूँ तिब्बत के बौद्ध-भिक्षूओं की मौन आवाजें 

लगता है
हर जगह एक चीख है
जो हर मौत के साथ 
दबा दी जाती है 
पर , मौत की चीखें 
आसानी से नही दबते 
अपनी प्रतिध्वनियों के साथ
और  विकराल हो जाते हैं 

इससे घबराकर मैं 
कानो को ,  आँखों को 
बंद कर लेता हूँ 
फिर हाथ हिलने लगते हैं  

Wednesday, October 6, 2010

शब्द ख़ामोशी के - अनुपम कर्ण


सात दिनों से पिता बेड पर ही था , गहरी चोट थी पैर में .
कई बार धीरे-धीरे उठने का प्रयास करता , पर हिम्मत टूट जाती .

पुत्र जो अपने काम में व्यस्त था , उस रात डाटते हुए कहा - ' क्या पिताजी ! आप प्रयास भी नही कर सकते , 
डॉक्टर ने कितनी बार कहा है चलने को , नही तो पैर हमेशा के लिए खराब हो जायेंगे... और आप हो की बेड पर ही परे रहते हो . '
पिता सहम कर रह गया .
उस रात उसने कई दफे उठ कर  चलने की चेष्टा की लेकिन पेरो की असह्य पीड़ा उसे फिर से बेड पर जाने को मजबूर कर देती . पुत्र ने सबकुछ खिडकी से देखा और झुंझलाकर सो गया . 

दूसरा लड़का जो अगली सुबह ही परदेश से आया था , पिताजी को देखने .
उसने ख़ामोशी से ही पिताजी की खामोश शक्लों को पढ़ लिया .
उठा , उठकर कंधा दिया , तीन दिनों बाद ही पिताजी चलने-फिरने लग गए 
लड़का पुनः परदेश चला गया 





Tuesday, September 28, 2010

यों ही खिल जाए मेरे लब पे वो हंसी की तरह - मनु गौतम



वो मेरी सांस में घुलता है जिंदगी की तरह 
वो जो मिलता है मुझसे एक अजनबी की तरह 

उसकी यादें भी उतर आती है बारिश जैसे 
उसका गम आँख में पलता भी है मोती की तरह 

यों ही वो ज़िक्र करे और मुझे हिचकी आये 
यों ही खिल जाए मेरे लब पे वो हंसी की तरह 
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