Wednesday, October 6, 2010

शब्द ख़ामोशी के - अनुपम कर्ण


सात दिनों से पिता बेड पर ही था , गहरी चोट थी पैर में .
कई बार धीरे-धीरे उठने का प्रयास करता , पर हिम्मत टूट जाती .

पुत्र जो अपने काम में व्यस्त था , उस रात डाटते हुए कहा - ' क्या पिताजी ! आप प्रयास भी नही कर सकते , 
डॉक्टर ने कितनी बार कहा है चलने को , नही तो पैर हमेशा के लिए खराब हो जायेंगे... और आप हो की बेड पर ही परे रहते हो . '
पिता सहम कर रह गया .
उस रात उसने कई दफे उठ कर  चलने की चेष्टा की लेकिन पेरो की असह्य पीड़ा उसे फिर से बेड पर जाने को मजबूर कर देती . पुत्र ने सबकुछ खिडकी से देखा और झुंझलाकर सो गया . 

दूसरा लड़का जो अगली सुबह ही परदेश से आया था , पिताजी को देखने .
उसने ख़ामोशी से ही पिताजी की खामोश शक्लों को पढ़ लिया .
उठा , उठकर कंधा दिया , तीन दिनों बाद ही पिताजी चलने-फिरने लग गए 
लड़का पुनः परदेश चला गया 





Tuesday, September 28, 2010

यों ही खिल जाए मेरे लब पे वो हंसी की तरह - मनु गौतम



वो मेरी सांस में घुलता है जिंदगी की तरह 
वो जो मिलता है मुझसे एक अजनबी की तरह 

उसकी यादें भी उतर आती है बारिश जैसे 
उसका गम आँख में पलता भी है मोती की तरह 

यों ही वो ज़िक्र करे और मुझे हिचकी आये 
यों ही खिल जाए मेरे लब पे वो हंसी की तरह 

Wednesday, September 22, 2010

जो सामने है , वही जिंदगी नहीं होती - विपिन जैन

                                               कभी जो आँख में ठहरी नमी नहीं होती
                                               हमारी सांस में उतरी खुशी नहीं होती 

                                               भरी निगाह में जो डबडबाती लगती है 
                                               दिलों की क्यों वो कभी रौशनी नहीं होती 

                                               सभी का होता है अपना सफर जमाने में 
                                               हरेक धार तो फिर भी नदी नहीं होती 

                                               शहर को सिर्फ मुझी से शिकायतें हैं बहुत 
                                               मगर बताइये , किसमे कमी नहीं होती 

                                              ये और बात है किसका नसीब कैसा है 
                                              जहां में वर्ना कहाँ बेबसी नहीं होती 

                                              कभी न देखी सुनी , वो भी जिंदगी है यहाँ 
                                              जो सामने है , वही जिंदगी नहीं होती !
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