Monday, August 30, 2010

मेरा किरदार जब भी जिंदगी से बात करता है -अशोक अंजुम

बड़ी मासूमियत से सादगी से बात करता है
मेरा किरदार जब भी जिंदगी से बात करता है

बताया है किसी ने जल्द ही ये सूख जाएगी
तभी से मन मेरा घंटों नहीं से बात करता है

कभी जो तीरगी मन को हमारे घेर लेती है
तो उठ के हौसला तब रोशनी से बात करता है

नसीहत देर तक देती है माँ उसको जमाने की
कोई बच्चा कभी जो अजनबी से बात करता है

मैं कोशिश तो बहुत करता हूँ उसको जान लूँ लेकिन
वो मिलने पर बड़ी कारीगरी से बात करता है

शरारत देखती है शक्ल बचपन की उदासी से
ये बचपन जब कभी संजीदगी से बात करता है

Wednesday, August 11, 2010

मैं सुबह से सुबह तक की बात ही करता रहा हूँ - देवेन्द्र आर्य


जिन्दगी लिखने लगी है दर्द से अपनी कहानी ,
मैं सुबह से सुबह तक की बात ही करता रहा हूँ


आज बचपन बैठकर
मुझसे शिकायत कर रहा है
किन अभावों के लिए मन
छाँव तक पहुँचा नहीं था ,
क्यों मुझे बहका दिया
कुछ रेत के देकर घरौँदे ?
मंजिलोँ की जुस्तजू को
आज तक बांचा नहीं था


क्या कहूँ मैं किस हाल में ढलता रहा हूँ
मैं सुबह से सुबह तक की बात ही करता रहा हूँ

अनसुनी कर दो भले
पर आज अपनी बात कह दूँ
एक अमृत - बूँद लाने
मैं सितारों तक गया हूँ
मुद्दतोँ से इस जगत की
प्यास का मुझको पता है
एक गंगा के लिए
सौ बार मैं शिव तक गया हूँ

मैं सभी के भोर के हित दीप सा जलता रहा हूँ
मैं सुबह से सुबह तक की बात ही करता रहा हूँ

मानता हूँ आज मेरे पाँव
कुछ थक से गए हैं
और मीलोँ दूर भी
इस पंथ पर कब तक चलूँगा ?
पर अभी तो आग बाकी है
अलावोँ को जलाओ
मैं सृजन के द्वार पर
नव भाव की वँशी बनूँगा

तुम चलो , मैं हर खुशी के साथ मिल चलता रहा हूँ ।
मैं सुबह से सुबह तक की बात ही करता रहा हूँ॥

Monday, June 28, 2010

झरते हैं शब्दबीज - बुद्धिनाथ मिश्र

आहिस्ता -आहिस्ता
एक- एक कर
झरते हैं शब्दबीज
मन के भीतर !
हरे धान उग आते
परती खेतों में
हहराते सागर हैं
बंद निकेतोँ में
धूप में चिटखता है
तन का पत्थर !
राह दिखाते सपने
अंधी खोहो में
द्रव सा ढलता मैं
शब्दों की देहोँ में
लिखवाती पीड़ा है
हाथ पकड़कर !
फसलें झलकेँ जैसे
अँकुरे दानों में
आँखों के आँसू
बतियाते कानों में
अर्थों से परे गूँजता
मद्धिम स्वर !
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